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वॉशरूम में पानी नहीं होने के कारण परिवार को ट्रेन से उतरना पड़ा, अब रेलवे भुगतान करेगा भारी भरकम हर्जाना

नई दिल्ली: ट्रेन के वॉशरूम में पानी नहीं होने के कारण एक यात्री को अपने 23 परिजनों के साथ बीच रास्ते में उतरना पड़ा। इस मामले में कर्नाटक के जिला उपभोक्ता आयोग ने दक्षिण पश्चिम रेलवे को सेवा में कमी का दोषी ठहराया है। आयोग ने रेलवे अधिकारियों को मूल टिकट के  1,000 रुपए वापस करने, 10,000 रुपए  मुआवजा देने और  5,000 रुपए मुकदमे के खर्च के तौर पर चुकाने का निर्देश दिया है।

क्या है पूरा मामला?
आयोग के 17 अक्टूबर के आदेश के अनुसार, शिवमोग्गा निवासी 52 वर्षीय टी. नागेंद्र अप्रैल 2025 में अपनी पत्नी, बच्चों और रिश्तेदारों के साथ आंध्र प्रदेश के तिरुपति-तिरुमाला मंदिरों के दर्शन करने गए थे। 14 अप्रैल, 2025 को तिरुपति से लौटने के बाद परिवार अगले दिन बेंगलुरु के यशवंतपुर रेलवे स्टेशन पहुंचा, जहां से उन्हें शिवमोग्गा जाना था। परिवार के 20 वयस्कों और चार बच्चों ने यशवंतपुर से शिवमोग्गा तक के लिए  1,000 रुपए के सेकंड क्लास टिकट खरीदे।

हालांकि, ट्रेन के यशवंतपुर से निकलकर तुमकुर की ओर बढ़ने के बाद यात्रियों को पता चला कि उनके कोच के वॉशरूम में पानी नहीं है। शिकायतकर्ता के अनुसार, पानी की कमी के कारण परिवार की महिलाओं और बच्चों को वॉशरूम इस्तेमाल करने में परेशानी हो रही थी।

नागेंद्र ने ट्रेन में तैनात रेलवे पुलिसकर्मियों को समस्या बताई और मदद मांगी। लेकिन समस्या का समाधान नहीं हुआ। उन्हें तुमकुर स्टेशन पर उतरकर स्टेशन मास्टर से शिकायत करने की सलाह दी गई। इसके बाद नागेंद्र अपने परिवार के साथ तुमकुर स्टेशन पर उतर गए और 15 अप्रैल, 2025 को स्टेशन मास्टर के पास लिखित शिकायत दर्ज कराई। रेलवे अधिकारियों ने शिकायत प्राप्त होने की पुष्टि भी की। परिवार को शिवमोग्गा पहुंचने के लिए रात करीब 8:30 बजे दूसरी एक्सप्रेस ट्रेन से यात्रा करनी पड़ी, जिसके लिए उन्हें 1,760 रुपए के अतिरिक्त टिकट खरीदने पड़े।

रेलवे ने आरोपों को किया खारिज
नागेंद्र ने 28 अगस्त, 2025 को रेलवे अधिकारियों को कानूनी नोटिस भेजकर मूल टिकट का पैसा वापस करने और परिवार को हुई परेशानी के लिए मुआवजे की मांग की। हालांकि, उनके अनुसार रेलवे ने न तो नोटिस का जवाब दिया और न ही उनकी मांग पूरी की। इसके बाद उन्होंने उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने मूल टिकट के 1,000 रुपए वापस करने के अलावा सेवा में कमी, अनुचित व्यापार व्यवहार, मानसिक परेशानी और कानूनी खर्चों के लिए कुल ₹10 लाख के मुआवजे की मांग की। वहीं, रेलवे अधिकारियों ने आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए कहा कि कोच में पानी की आपूर्ति सुनिश्चित की जाती है और ट्रेन में वॉशरूम, बिजली तथा पंखों जैसी यात्री सुविधाएं उपलब्ध थीं।

उपभोक्ता आयोग ने क्या कहा?
शिवमोग्गा जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के अध्यक्ष टी. शिवन्ना और सदस्य बी. डी. योगानंद की पीठ ने रेलवे टिकट, तुमकुर स्टेशन पर दर्ज लिखित शिकायत और अन्य दस्तावेजों की जांच की। आयोग ने पाया कि उपलब्ध दस्तावेज नागेंद्र के इस दावे का समर्थन करते हैं कि वॉशरूम में पानी की समस्या के कारण परिवार को तुमकुर में उतरना पड़ा था। रेलवे अधिकारी कोच में पानी की कमी नहीं होने के संबंध में पर्याप्त सबूत पेश नहीं कर सके। आयोग ने यह भी कहा कि रेलवे अधिकारियों ने स्टेशन मास्टर के पास दर्ज शिकायत और बाद में भेजे गए कानूनी नोटिस पर उचित कार्रवाई नहीं की। अधिकारियों ने शिकायत में दर्ज वर्ष की गलती पर ध्यान दिया, लेकिन यात्री की मूल समस्या का समाधान करने पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। पीठ ने स्पष्ट किया कि शिकायत छोटी हो या गंभीर, संबंधित रेलवे अधिकारियों की जिम्मेदारी है कि वे उसका उचित समाधान करें और शिकायतकर्ता को की गई कार्रवाई की जानकारी दें।
-आयोग ने रेलवे की इस लापरवाही को सेवा में कमी माना।
-रेलवे को 45 दिनों के भीतर करना होगा भुगतान

शिकायत को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए आयोग ने रेलवे अधिकारियों को निम्न निर्देश दिए:
– 1,000 रुपए का रिफंड: मूल टिकट की राशि 45 दिनों के भीतर लौटानी होगी। निर्धारित समय में भुगतान होने पर 15 अप्रैल, 2025 से 6% सालाना ब्याज भी देना होगा।
–  10,000 रुपए  का मुआवजा: परिवार को हुई असुविधा, परेशानी और मानसिक तनाव के लिए।
–  5,000 रुपए मुकदमे का खर्च: कानूनी और अदालती खर्चों के लिए।
इस तरह रेलवे को टिकट रिफंड के अतिरिक्त कुल  15,000 रुपए मुआवजे और मुकदमे के खर्च के रूप में देने होंगे।

यदि मुआवजे और मुकदमे के खर्च का भुगतान आदेश के 45 दिनों के भीतर नहीं किया जाता, तो इन राशियों पर 17 अक्टूबर, 2026 से भुगतान होने तक 10% सालाना ब्याज लगेगा। टिकट रिफंड में देरी होने पर उस पर भी निर्धारित शर्तों के अनुसार 10% सालाना ब्याज देना होगा। हालांकि, आयोग ने शिकायतकर्ता की ओर से मांगे गए  10 लाख रुपए के मुआवजे को मंजूरी नहीं दी। आयोग का कहना था कि रिकॉर्ड में मौजूद साक्ष्य इतनी बड़ी राशि देने को उचित नहीं ठहराते।






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